Pataleshwar Temple: पांडवों के वनवास और द्रोणाचार्य की तपोस्थली से जुड़ा आस्था का केंद्र है पातालेश्वर मंदिर,  जानिए क्या संबंध है अश्वत्थामा से?

Thu, Feb 12 , 2026, 12:35 PM

Source : Hamara Mahanagar Desk

Pataleshwar Temple, linked to the Mahabharata:  उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में स्थित कालपी नगर (The city of Kalpi) अपनी ऐतिहासिक, पौराणिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्राचीन काल से प्रसिद्ध रहा है। यमुना नदी के दक्षिणी तट (bank of the Yamuna River) पर बसा यह नगर विशाल किले के साथ-साथ धार्मिक स्थलों के कारण भी विशेष पहचान रखता है। इन्हीं स्थलों में कालपी किले के पश्चिमी भाग में स्थित पातालेश्वर मंदिर (Pataleshwar Temple) एक महत्वपूर्ण शिवालय है, जिसकी मान्यता महाभारत काल से जुड़ी बताई जाती है।

वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. हरी मोहन पुरवार के अनुसार पांडवों ने वनवास काल के दौरान कालपी क्षेत्र में कुछ समय व्यतीत किया था। क्षेत्र में महाभारत काल (Mahabharata period) से जुड़े कई स्थलों की उपस्थिति इसे ऐतिहासिक एवं पौराणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है। पातालेश्वर मंदिर को भी उसी कालखंड से जोड़कर देखा जाता है। नगर के गिरि (हरिगंज) मोहल्ले में कालपी किले के समीप स्थित यह प्राचीन शिवालय शांत एवं शीतल वातावरण के लिए जाना जाता है। किले के आसपास निर्मित यह एकमात्र शिव मंदिर माना जाता है। मंदिर परिसर का वातावरण अत्यंत शांतिपूर्ण है, जिससे श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति होती है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर पांच हजार वर्ष से अधिक प्राचीन बताया जाता है। द्वापर युग में इस शिवलिंग को ‘मणिकेश्वर महादेव (Manikeshwar Mahadev)’ के नाम से जाना जाता था। मंदिर परिसर में लगे सूचना पट्ट पर भी इसका प्राचीन नाम मणिकेश्वर अंकित है। शिव पुराण में ‘मणिकेश्वर’ नाम भगवान शिव के सहस्र नामों में उल्लिखित होने की बात कही जाती है। स्थानीय मान्यता है कि किले के निर्माण के समय शिवलिंग की गहराई और धरातल से नीचे की ओर जाते स्वरूप के कारण इसका नाम पातालेश्वर पड़ गया। लोगों का विश्वास है कि यह स्वयंभू शिवलिंग (self-manifested Shivalinga) है और इसकी गहराई का आज तक सही अनुमान नहीं लगाया जा सका है।

एक अन्य कथा के अनुसार कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य ने पुत्र प्राप्ति की कामना से इसी शिवलिंग की कठोर तपस्या की थी। भगवान शिव के प्रसन्न होने पर उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान मिला और आगे चलकर उनके पुत्र का नाम अश्वत्थामा रखा गया। जनश्रुति के अनुसार अश्वत्थामा को भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त था। इतिहासकारों का मत है कि मंदिर की वर्तमान स्थापत्य शैली मराठा काल से संबंधित प्रतीत होती है। मराठा शासनकाल में इसका जीर्णोद्धार कराया गया था। मंदिर के पीछे एक नाग मंदिर स्थित है, जिस पर प्राचीन शिलालेख अंकित है, हालांकि वह अब अपठनीय हो चुका है। मंदिर के सामने सीताराम जी का एक मठ भी है, जो क्षेत्र की धार्मिक परंपरा को दर्शाता है।

भौगोलिक दृष्टि से मंदिर चंदेलकालीन कालपी किले के अवशेषों के निकट स्थित है और किले से इसकी दूरी लगभग 200 मीटर बताई जाती है। इतिहासकारों के अनुसार किसी भी दुर्ग के समीप धार्मिक स्थल का होना उस काल की परंपरा का हिस्सा था, जिससे पातालेश्वर मंदिर के प्राचीन महत्व का संकेत मिलता है। वर्तमान में भी पातालेश्वर मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। सावन, महाशिवरात्रि और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। यह स्थल धार्मिक महत्व के साथ-साथ ऐतिहासिक एवं पौरातात्विक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

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