नयी दिल्ली: लोक सभा में गुरुवार को विपक्षी सदस्यों ने औद्योगिक संबंध संहिता (संशोधन) विधेयक (Industrial Relations Code Amendment Bill), 2026 को श्रमिकों के हितों के विरुद्ध करार देते हुए कहा कि इस कानून के लागू होने से कामगारों के अधिकारों में और ह्रास होगा। विधेयक को विचार करने तथा पारित किये जाने के लिए सदन में प्रस्तुत किये जाने के बाद इस पर चर्चा की शुरुआत करते हुए कांग्रेस के के. सुरेश (K. Suresh of the Congress party) ने कहा कि देश भर के श्रमिक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए जब गुरुवार को देशव्यापी हड़ताल कर रहे हैं, तब यह संशोधन विधेयक लाया गया है। उन्होंने कहा कि 2020 में पारित की गयीं तीन श्रम संहितायें जल्दबाजी में पारित की गयी थीं, जिनमें श्रमिकों के हितों की तिलांजलि दी गयी थी।
अब इस विधेयक के जरिए श्रमिकों के अधिकारों को और कम किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि 300 तक श्रमिकों-कर्मचारियों वाली कंपनियां, फैक्ट्री और कारखाने सरकार की अनुमति के बगैर बंद किये जा सकेंगे। सुरेश ने कहा कि 90 प्रतिशत कार्यबल असंगठित क्षेत्र में काम करता है, उसकी पेंशन, रोजगार, स्वास्थ्य सुरक्षा का ध्यान कौन रखेगा। महिलाओं की भागीदारी कार्यबल में कम हो रही है। आज कारपोरेट सेक्टर को काफी बढ़ावा दिया जा रहा है। कारपोरेट की मांगें मान ली जाती हैं। श्रमिकों की मांगें ठुकरा दी जा रही हैं। मोदी सरकार श्रमिकों की असुरक्षा को संस्थागत रूप दे रही है।
उन्होंने कहा कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार श्रमिकों के हितों में काम करती थी। तत्कालीन सरकार महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) लायी थी। संप्रग सरकार सामाजिक न्याय के लिए काम करती थी। आज सार्वजनिक उपक्रम कमजोर हो रहे हैं, उनका निजीकरण किया जा रहा है। अनुबंध पर अधिक कर्मचारी लाये जा रहे हैं। यह विधेयक रोजगार सुरक्षा को क्षति पहुंचाता है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के दर्शन सिंह चौधरी ने कहा कि इस विधेयक में पहले के श्रमिकों के जुड़े कानूनों को समेकित करके नयी श्रम संहितायें लायी गयी हैं। इस विधेयक को प्रगतिशील सुधार के रूप में जाना जाना चाहिए।
सरकार की मंशा श्रमिक- मालिक के बीच तालमेल के जरिए उद्योगों में तरक्की लाना है। सरकार गैरकानूनी तालाबंदी पर रोक लगाना चाहती है। सरकार के इन कदमों से अर्थव्यवस्था में सुधार लाना है। इस सरकार की ओर से लायी गयीं श्रमिक संहितायें पूरे देश में लागू होंगी। इनके लागू होने से औद्योगिक विवाद सुलझाना जयादा सरल हो जायेगा। समाजवादी पार्टी के सांसद अफजल अंसारी ने कहा कि 2020 में जब श्रम संहितायें लागू की गयी थीं, तो बड़े-बड़े दावे किये गये थे और अब उनमें संशोधन करना पड़ रहा है। सरकार जब एक मजबूत कानून नहीं बना सकती तो यह श्रमिकों के हितों की बात करेगी, ऐसा सोचना निरर्थक है।
उन्होंने कहा कि अब श्रमिकों की छंटनी को आसान कर दिया गया है। ऐसी स्थिति में सरकार के प्रति श्रमिकों में घोर निराशा है। उद्योगों को ढील दी जा रही है। तीन सौ कर्मचारियों वाली कंपनियों-कारखानों में जब चाहे तब कामगारों को नौकरी से निकाला जा सकता है। सरकार को मजदूरों के हितों के बारे में सोचना चाहिए।तृणमूल कांग्रेस के कल्याण बनर्जी ने कहा कि आज हालत यह हो गयी है कि कंपनियों, फैक्ट्रियों और कारखानों में काम करने वाले कर्मचारियों को मिलने वाली भविष्य निधि की सुविधा को हटा दिया गया है। सरकारी उपक्रमों का निजीकरण किया जा रहा है। संविदा पर कर्मचारी रखे जा रहे हैं।
कर्मचारियों की रोजगार सुरक्षा को समाप्त किया जा रहा है। कर्मचारियों को आज इतनी दुश्वारियां पेश आ रही है, जिन्हें सोचा भी नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि हर दिन एक जैसा नहीं होता, एक दिन कामगार इस सरकार को बतायेंगे कि इसने उनके साथ क्या किया था। बनर्जी ने कहा कि देश में रोजगार न मिलने की हालत यह हो गयी है कि देश के ढाई से तीन करोड़ कर्मचारी रोजी-रोटी के लिए विदेशों में हैं। उन्होंने कहा कि सरकार सिर्फ दो उद्योगपतियों के हितों के लिए काम कर रही है। तेलुगू देशम पार्टी के अप्पलानायडू कालीसेट्टी ने कहा कि नयी श्रम संहिताओं के माध्यम से असंगठित क्षेत्र मजबूत होगा। महिला कामगारों को सुरक्षा प्रदान की जायेगी। व्यवसाय करने में आसानी होगी। नयी श्रम संहितायें उत्पादकता को बढ़ावा देने वाली हैं। इससे देश की आर्थिक वृद्धि अच्छी होगी।
औद्योगिक उत्पादन में तेजी आयेगी। कामगारों को गरिमा प्रदान की गयी है। श्रम कानूनों में पारदर्शिता लायी गयी है। सरकार का उद्देश्य सहकारी संघवाद को सुदृढ़ करना है। शिवसेना (यूबीटी) के अरविंद सावंत ने कहा कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण कर रही है। कई संस्थानों में 20 से 25 साल तक दैनिक पारिश्रमिक पर कर्मचारियों को रखा जाता है, उनके बारे में सरकार को सोचना चाहिए। कामगारों के लिए इस समय सबसे बड़ी समस्या संविदा पर नियुक्ति है, चौदह-चौदह साल तक काम करने वाले कर्मचारी नियमित नहीं किये जा रहे हैं। एक्सिस बैंक जैसे संस्थान में 10-10 वर्ष तक एक ही वेतन पर कर्मचारी काम करते रहते हैं। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पहले 100 से अधिक कर्मचारियों वाले संस्थानों को बंद करने से पहले नियोक्ता को सरकार की अनुमति लेनी पड़ती थी लेकिन अब इसे बढ़ाकर 300 कर्मचारी कर दिया गया है। कर्मचारी राज्य बीमा निगम का निजीकरण के बारे में सोचा जा रहा है, सरकार को ऐसा नहीं सोचना चाहिए।सरकार को कर्मचारियों के हक छीनने का काम तो नहीं करना चाहिए। इससे पहले श्रम एवं रोजगार मंत्री मनसुख मांडविया ने संशोधन विधेयक को चर्चा एवं पारित कराने के लिए पेश करते हुए कहा कि पूर्व में लायी गयीं नयी श्रम संहिताओं में मामूली संशोधन करना है। इसके लिए यह संशोधन विधेयक लाया गया है।



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Thu, Feb 12 , 2026, 04:07 PM