नयी दिल्ली: उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम (The Supreme Court Collegium) ने मंगलवार को संविधान के अनुच्छेद 224ए (Article 224A) का इस्तेमाल कर इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) के पांच सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को दो साल के लिये तदर्थ न्यायाधीश के तौर पर फिर से नियुक्त किया है। यह कदम आपराधिक मामलों की लंबित भारी संख्या के मद्देनजर उठाया गया है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति जे के माहेश्वरी वाले कॉलेजियम ने न्यायमूर्ति मोहम्मद फैज आलम खान, मोहम्मद असलम, सैयद आफताब हुसैन रिजवी, रेणु अग्रवाल और ज्योत्सना शर्मा को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के तदर्थ न्यायाधीशों के रूप में नियुक्ति की मंजूरी दी।
इन नियुक्तियों के साथ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़कर 115 हो जायेगी, हालांकि यह स्वीकृत 160 न्यायाधीशों की संख्या से अब भी कम है। उम्मीद है कि इन नियुक्तियों से खासकर आपराधिक लंबित मामलों के निपटारे में मदद मिल सकती है। संविधान में यह प्रावधान है कि उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से लंबित मामलों की अधिकता या रिक्तियों की स्थिति से निपटने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को तदर्थ न्यायाधीश के रूप में नियुक्त कर सकते हैं, हालांकि अनुच्छेद 224ए के तहत ऐसी नियुक्तियां बहुत कम होती हैं। इससे पहले उच्चतम न्यायालय ने ऐसी नियुक्तियां केवल तीन बार की हैं।
1972 में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति सूरज भान, 1982 में मद्रास उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति पी. वेणुगोपाल और 2007 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति ओ पी श्रीवास्तव की नियुक्ति हुई थी उच्चतम न्यायालय ने 2021 के एक निर्णय में 'निष्क्रिय' संवैधानिक प्रावधान का पुन: उपयोग किया, जिसे उच्च न्यायालयों में बड़ी तादाद में लंबित मामलों के समाधान के रूप में वर्णित किया गया है। सूत्रों ने संकेत दिया कि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने वर्तमान प्रक्रिया तब शुरू की, जब उन्होंने देखा कि उच्च न्यायालय सर्वोच्च न्यायालय के अनुच्छेद 224ए के इस्तेमाल के निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं।
इसके बाद सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को तदर्थ न्यायाधीशों के लिए सिफारिशें मांगने वाले पत्र भेजे गये। अभी तक तीन उच्च न्यायालय से इस तरह की सिफारिश मिली हैं। इनमें से इलाहाबाद उच्च न्यायालय की सिफारिश को मंजूरी दे दी गयी है। बाकी सिफारिशों पर विचार करने के लिए कॉलेजियम के फिर से बैठने की उम्मीद है। अन्य उच्च न्यायालय अभी सुझाव भेजने की प्रक्रिया में हैं।
पिछले साल दिसंबर में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने 2021 के निर्णय को स्पष्ट किया और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों को तदर्थ न्यायाधीशों को शामिल करते समय अधिक लचीलेपन की अनुमति दी। इससे पहले जनवरी 2025 में तीन न्यायाधीशों की पीठ ने तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति की शर्तों में और ढील दी और 20 प्रतिशत से कम रिक्तियां होने पर भी ऐसी नियुक्तियों की इजाजत दी थी। वर्ष 2021 के फैसले में हालांकि यह दोहराया गया था कि अनुच्छेद 224ए का सहारा तभी लिया जाना चाहिए, जब नियमित न्यायिक रिक्तियों को भरने के लिए कदम उठाये जा चुके हों।
सूत्रों के अनुसार, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में नियुक्त किये गये पांच तदर्थ न्यायाधीशों को विशेष रूप से लंबे समय से लंबित आपराधिक अपीलों, जमानत के मामलों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों के निस्तारण के लिए चुना गया है। तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया तुलनात्मक रूप से तेज होती है, क्योंकि ये न्यायाधीश पहले ही पीठ में अपनी सेवाएं दे चुके होते हैं। उच्च न्यायालय का कॉलेजियम उनके पिछले फैसलों का मूल्यांकन करता है। नयी नियुक्तियों के विपरीत, सामान्यतः इनके लिए खुफिया जानकारी नहीं मांगी जाती, जब तक कि कोई बड़ी चूक न हुई हो।



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Wed, Feb 04 , 2026, 03:24 PM