नयी दिल्ली: कैंसर के मरीजों के लिये उन्नत रेडियोसर्जरी सिस्टम 'वेरियन एज' आशा की नयी किरण लेकर आया है जिससे पीड़ित मरीज को सटीक इलाज के साथ जल्द आराम मिलेगा। इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल ने मंगलवार को यहां संवाददाता सम्मेलन में यह जानकारी दी। रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. जीके जाधव ने बताया कि अपोला अस्पताल में अत्याधुनिक रेडियोसर्जरी व्यवस्था 'वेरियन एज' को शुरू किया है। हाइपरआर्क तकनीक से युक्त यह उन्नत प्रणाली जटिल और शरीर के कठिन हिस्सों में स्थित ट्यूमर के उपचार को अधिक सटीक, सुरक्षित और प्रभावी बनाती है।
अस्पताल प्रबंधन के अनुसार यह तकनीक सब-मिलीमीटर सटीकता के साथ रेडिएशन देने में सक्षम है, जिससे स्वस्थ ऊतकों को न्यूनतम नुकसान पहुंचता है। डॉ. जाधव ने कहा कि वेरियन एज तकनीक से छोटे से लेकर बड़े और जटिल ट्यूमर तक के उपचार में नई संभावनाओं के द्वार खोलता है। उन्होंने बताया कि जटिल स्थानों पर स्थित ट्यूमर के मामलों में भी अब अधिक सुरक्षित और नियंत्रित रेडिएशन दिया जा सकेगा। डॉ. मनु भदौरिया ने बताया कि इस नई प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह वास्तविक समय (रियल-टाइम) में ट्यूमर की गतिविधि को ट्रैक करती है।
मरीज की सांस के दौरान ट्यूमर की हलचल को ध्यान में रखते हुए यह रेडिएशन बीम को स्वतः समायोजित करती है, जिससे उपचार की सटीकता बनी रहती है। इससे आसपास के महत्वपूर्ण अंगों, विशेषकर हृदय और अन्य संवेदनशील ऊतकों की बेहतर सुरक्षा संभव हो पाती है। डॉ. भदौरिया ने बताया कि इस तकनीक में डीप इंस्पिरेशन ब्रीथ होल्ड (डीआईबीएच) जैसी उन्नत मोशन मैनेजमेंट सुविधा भी शामिल है। यह विशेष रूप से बाएं स्तन कैंसर के मरीजों के लिए लाभकारी मानी जा रही है, क्योंकि इससे रेडिएशन के दौरान हृदय को सुरक्षित रखने में मदद मिलती है। इसके अलावा पेट, लिवर, फेफड़े, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल और जेनिटोयूरिनरी ट्यूमर के उपचार में भी यह तकनीक बेहतर इमेजिंग और उच्च सटीकता प्रदान करती है।
डॉ. सपना मनोचा वर्मा ने कहा कि यह तकनीक सांस के साथ ट्यूमर की स्थिति के अनुसार रेडिएशन बीम को स्वतः समायोजित करती है। इससे स्वस्थ ऊतकों की सुरक्षा बेहतर होती है और मरीजों को कम दुष्प्रभावों के साथ तेजी से रिकवरी मिलती है। वरिष्ठ सलाहकार डॉ. रॉबिन खोसा ने बताया कि यह एक ही सत्र में कई ब्रेन मेटास्टेसिस जैसे जटिल मामलों का उपचार करने में सक्षम है। इससे कुल इलाज का समय पारंपरिक रेडियेशन उपचार की तुलना में लगभग एक-तिहाई तक कम हो सकता है।
इससे मरीज को कम असुविधा होती है और उपचार अधिक व्यवस्थित तरीके से पूरा किया जा सकता है। बेहतर इमेजिंग के कारण डॉक्टर जरूरत पड़ने पर अधिक डोज भी सुरक्षित रूप से दे सकते हैं, जिससे इलाज की सफलता दर बढ़ने की संभावना रहती है। इस अवसर पर डॉ. अदिति अग्रवाल, डॉ. देवाशीष त्रिपाठी भी उपस्थित थे। विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रणाली विशेष रूप से उन ट्यूमर के लिए प्रभावी है जो शरीर के संवेदनशील या कठिन हिस्सों में स्थित होते हैं।



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Wed, Feb 25 , 2026, 08:37 AM