नयी दिल्ली। भारत और विश्व ऊर्जा बाजार (India and the Global Energy Market) पर पश्चिम एशिया (West Asia) के तनाव का प्रभाव साफ नजर आने लगा है, क्योंकि ईरान और अमेरिका-इजरायल संघर्ष ने तेल, गैस और शिपिंग की आपूर्ति में बड़े व्यवधान पैदा किये हैं। देश की ऊर्जा कंपनियां अब तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की आपूर्ति में कटौती और कीमतों में वृद्धि के लिए तैयार हैं, जो भारी मशीनरी, उर्वरक और पेट्रो केमिकल प्लांट सहित कई उद्योगों में ईंधन का काम आती है। इस बीच खाड़ी में स्थिति के कारण समुद्री मार्गों पर भी गंभीर व्यवधान आ रहे हैं। भारत के एलएनजी आपूर्ति के बड़े स्रोत कतर ने रास लाफान इंडस्ट्रियल सिटी स्थित अपनी प्रमुख एलएनजी सुविधाओं को बंद कर दिया है। कतर की यह बंदी विश्व के सबसे बड़े एलएनजी निर्यातक के उत्पादन को रोक देती है और गैस की कीमतों को तेजी से बढ़ा सकती है। यह फैसले ईरान के ड्रोन हमलों के बाद लिये गये हैं, जिनके कारण रास लाफान और मेसाइद औद्योगिक क्षेत्रों की उत्पादन गतिविधियां रुक गयी हैं।
भारत जैसे बड़े एलएनजी आयातक देश पर इसका सीधा असर दिख रहा है। कतर तथा संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे खाड़ी देशों से एलएनजी आयात पर निर्भरता के कारण उपयोगकर्ता कंपनियों को आपूर्ति में कमी का सामना करना पड़ रहा है। इस कारण गैस आपूर्ति में कटौती कर दी गयी है और पेट्रोनेट एलएनजी तथा अन्य आयातक कम्पनियों ने ग्राहक इकाइयों को सीमित आपूर्ति की सूचना दी है।साथ ही, संकट की दूसरी बड़ी वजह तेल की कीमतों में उछाल है। खाड़ी के तनाव के बीच ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गयी है और कुछ बाजारों में यह 82 डॉलर तक पहुंच चुकी है। इससे तेल की बढ़ती आयात लागत से भारत के घरेलू ईंधन की कीमतों एवं मुद्रास्फीति पर दबाव बढ़ सकता है।
महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग होर्मुज़ जलडमरूमध्य से व्यापार की वस्तुओं का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है। दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत वैश्विक तेल एवं गैस तो इस मार्ग से आती ही है, साथ ही भारत का करीब 60 प्रतिशत एलएनजी तथा लगभग आधा कच्चा तेल इसी मार्ग से आता है। इससे होने वाले व्यवधान से पोतवहन, लागत, बीमा प्रीमियम और परिवहन दरों में तेज बढ़ोतरी देखने को मिल रही है, जो ऊर्जा आपूर्ति की लागत को और बढ़ा सकती है। विश्लेषक चेतावनी दे रहे हैं कि अगर संघर्ष लंबा रहा, तो तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब या उससे ऊपर तक बढ़ सकती हैं, जिससे अर्थव्यवस्था पर और बड़ा दबाव पड़ेगा। भारत ने खाड़ी संकट के समय आंशिक बचाव की उम्मीद में पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा आपूर्ति को विविध करने के प्रयास किये हैं। रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना, अमेरिका तथा अफ्रीका जैसे क्षेत्रों से आपूर्ति में वृद्धि करना इसमें शामिल है। इसके बावजूद वैश्विक ऊर्जा बाजार की अस्थिरता के मुकाबले चुनौतियां बरकरार हैं।
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