फिल्म का नाम : 72 हूरें
एक्टर्स : पवन मल्होत्रा, आमिर बशीर
निर्देशन: संजय पूरन सिंह चौहान
निर्माता: गुलाब सिंह तंवर, किरण डागर, अनिरुद्ध तंवर
सह-निर्माता: अशोक पंडित
रेटिंग : ***
72 Hoorain Review In Hindi: पड़ोसी मुल्क (neighboring country) ने अपनी गलत फितरत को अंजाम देने के लिए कई बार आतंकवाद (terrorism) का सहारा लिया है. एक शायर ने कहा है कि ‘वो मंदिर भी उड़ाता है, वो मस्जिद भी उड़ाता है; फिर भी बड़े फक्र से वो खुद को जिहादी कहलाता है’. इतिहास साक्षी है, जब भी भारत ने पाकिस्तान की तरफ (friendship towards Pakistan) दोस्ती का हाथ बढ़ाया है, तब इस मुल्क ने हमारी पीठ में छुरा खोंपा है.
धर्म के नाम पर लोगों को बहकाना और उन्हें 72 हूरें, जन्नत जैसे सुनहरें सपने दिखाते हुए टेररिज्म के जाल में फंसाना, फिर इस जाल में फंसे हुए लोगों के जरिए भारत पर आतंकवादी हमले करवाना, पड़ोसी मुल्क के लिए कोई नई बात नहीं है. उनकी इस हरकतों के तमाम देशवासी गवाह हैं. राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म निर्देशक संजय पूरन सिंह चौहान की फिल्म ’72 हूरें’(72 Hooren) कुछ समाजकंटकों के बहकावें में आकर धर्म के नाम पर अधर्म करने वालों को आईना दिखाने का काम करती है. पढ़ें इस फिल्म का पूरा रिव्यू.
कहानी
ये कहानी है हाकिम (Pawan Malhotra) और साकिब (Aamir Bashir) की, फिल्म की शुरुआत होती हैं अमेरिका के स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी के हाथ पर लटकने वाले हाकिम से. एक मौलाना की बातों में आकर ये दो अधेड़ उम्र के बंदे जन्नत और 72 हूरों के लालच में आकर पाकिस्तान से भारत आ जाते हैं. एक तरफ धर्म और जिहाद की बातें करने वाले हाकिम की घिनौनी नजर इस बात की हकीकत बयां करती हैं कि न तो उनके इरादें पाक है न ही उनकी नियत. मुंबई के गेट वे ऑफ इंडिया पर अल्लाह का नाम लेकर ये दोनों आत्मघाती हमलावर (सुसाइड बॉम्बर) बम विस्फोट कराते हैं.
मरने के बाद शुरू होता है हाकिम और साकिब का 72 हूरों को पाने का सफर. क्या उनकी रूह जन्नत तक पहुंच पाती हैं, क्या उन्हें 72 हूरें मिलती हैं, क्या मौलवी के प्रवचन के अनुसार इन आतंकियों को लेने के लिए अल्लाह के फरिश्ते आते हैं, ये जानने के लिए आपको थिएटर में ’72 हूरें’ देखनी होगी.
राइटिंग और डायरेक्शन
फिल्म देखने के दौरान साफ पता चलता है कि इस फिल्म को बनाने के लिए राइटर और निर्देशक की तरफ से काफी रिसर्च और मेहनत की गई है. अनिल पांडे द्वारा लिखी गई ये फिल्म ख्याल रखती हैं कि इस कहानी से किसी भी धर्म की भावनाएं आहात न हो लेकिन साथी ही धर्म के नाम पर बहकने वाले लोगों इस फिल्म के जरिए एक अच्छा सबक सीखने मिले. निर्देशक संजय पूरन सिंह चौहान ने व्यंग यानी सटायर स्टाइल में फिल्म में मासूमों का ब्रैनवॉश करने वालों के बारें में कुछ ऐसी बातें बताई है, जिसे देख आप हैरान रह जाएंगे. पावरफुल स्क्रीन प्ले और असरदार डायलॉग इस फिल्म आखिरी पल तक दिलचस्प बनाते हैं. एक संवेदनशील विषय को निर्देशक ने जिम्मेदारी और गंभीरता से पेश किया है.
एक्टिंग
पवन मल्होत्रा और आमिर बशीर इस फिल्म में आतंकवादियों के किरदार में नजर आते हैं. इन दोनों ने अपने करियर की शुरुआत थिएटर से की थी. शायद यही वजह है कि अपने अभिनय के दम पर पूरे 101 मिनट तक ऑडियंस से कनेक्ट करने में वे दोनों पूरी तरह से कामयाब हो गए हैं. धर्म के गुरूर से लेकर दिल दहलाने वाली सच्चाई का सामना होने तक धीरे धीरे इन दो किरदारों की बॉडी लैंग्वेज और एक्सप्रेशन में आने वाला बदलाव इन दोनों ने बिलकुल सही तरह से पकड़ा हैं.
सिनेमेटोग्राफी और टेक्निकल
इस फिल्म को ज्यादातर मोनोक्रोमेटिक अंदाज में पेश किया गया है, जहां जहां जरुरी है वही कलर्स और वीएफएक्स का इस्तेमाल किया गया है. वरना ज्यादातर फिल्म ब्लैक एंड वाइट में ही देखी जा सकती हैं. कुछ जगह छोड़कर कैमरा एंगल और पिक्चराइजेशन काफी सटीक है. कहा जाता है फिल्म को प्रभावी बनाना एडिटर के हाथ में होता है और 72 हूरें में एडिटर ने अपना काम एक हीरो की तरह किया है, जिसकी वजह से ये फिल्म काफी क्रिस्प है. फिल्म का पार्श्वसंगीत और असरदार हो सकता था.
क्यों देखें?
‘जिहाद में शामिल होकर अल्लाह के खास बंदें बन जाओगे’ इस झांसे में फंसने वाले हर किसी के लिए ये फिल्म एक सबक पेश करती है. बेगुनाह को मारकर न तो जन्नत मिलती है, न तो हूरें क्योंकि कोई भी धर्म लोगों को नफरत करना नहीं सिखाता, न ही नफरत फैलाने वालों को माफ करता है, इस स्ट्रांग मैसेज के लिए ये फिल्म जरूर देखनी चाहिए.
क्या है खामियां?
ये फिल्म असरदार है लेकिन जिन युवाओं को मध्यनजर ये फिल्म बनाई गई है, उन्हें फिल्म का ब्लैक एंड व्हाइट अंदाज बोरिंग लग सकता है. एंटरटेनमेंट के उद्देश्य से अगर आप इस फिल्म को देखने के बारें में सोच रहे हैं, तो ये फिल्म आपके लिए नहीं है.



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Fri, Jul 07 , 2023, 11:34 AM