कौशांबी। मध्ययुगीन हिंदी साहित्य की भक्त परंपरा के प्रमुख संत मलूक दास (Saint Maluk Das) की जयंती आगामी सात अप्रैल यानी वैशाख बदी पंचमी को उनकी जन्मस्थली कौशांबी जिले के कड़ा में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाएगी। प्राप्त जानकारी के अनुसार संत मलूक दास गोस्वामी तुलसीदास (Goswami Tulsidas) के समकालीन थे। उनका जन्म संवत 1631 वैशाख बदी पंचमी को कड़ा ग्राम में एक खत्री परिवार में हुआ था। उनके पिता सुंदरलाल प्रतिष्ठित व्यवसायी थे और परिवार में कंबल का व्यापार होता था।
बताया जाता है कि बाल्यावस्था से ही मलूक दास की रुचि साधु-संतों की सेवा में थी। औपचारिक शिक्षा में उनकी विशेष रुचि नहीं थी, किंतु अपनी विलक्षण प्रतिभा के कारण वे ककहरा के प्रत्येक वर्ण पर दोहे रचते और भक्ति गीत गाया करते थे। उनका प्रसिद्ध दोहा “अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए, सबके दाता राम” आज भी जनमानस में अत्यंत लोकप्रिय है और ग्रामीण अंचलों से लेकर खेत-खलिहानों तक गूंजता है।
इतिहासकारों के अनुसार उनके समय में मुगल शासक औरंगज़ेब का शासन था। जनश्रुतियों के मुताबिक उनके प्रभाव से कड़ा क्षेत्र में लगाया गया जजिया कर समाप्त कर दिया गया था। दीर्घायु संत मलूक दास ने लगभग 108 वर्ष की आयु में देह त्याग किया। वर्तमान में कड़ा स्थित उनकी समाधि श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। जयंती के अवसर पर मलूक आश्रम कड़ा में प्रतिवर्ष की भांति भजन-कीर्तन, दीपदान तथा गरीबों को भोजन कराने सहित विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा



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