मुंबई: देवेंद्र फडणवीस सरकार (Devendra Fadnavis government) ने शुक्रवार को विधानसभा में 'महाराष्ट्र धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2026' पेश किया। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य बलपूर्वक या अवैध तरीके से हिंदू धर्म से अन्य में धर्मांतरण पर रोक लगाना है। विधेयक को सदन में रखते हुए महाराष्ट्र के गृह राज्य मंत्री पंकज भोयर ने कहा कि इसका लक्ष्य धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करना है। यह कानून जबरदस्ती, धोखाधड़ी, लालच या शादी के माध्यम से किये जाने वाले अवैध धर्मांतरण को प्रतिबंधित करेगा।
विधेयक के अनुसार, उपहार, नकद राशि, नौकरी, मुफ्त शिक्षा, शादी का वादा, बेहतर जीवनशैली या चमत्कारी उपचार का प्रलोभन देकर गैर-हिंदू धर्मों में धर्मांतरण कराना अवैध होगा। सामूहिक धर्मांतरण (दो या दो से अधिक व्यक्ति) और बल प्रयोग को भी इसमें स्पष्ट रूप से परिभाषित कर प्रतिबंधित किया गया है। कानून के तहत गैर-हिंदू धर्म अपनाने की प्रक्रिया में शामिल व्यक्ति के रिश्तेदार अवैध धर्मांतरण की शिकायत दर्ज करा सकेंगे। ये अपराध गैर-जमानती होंगे। पुलिस के लिए ऐसी शिकायतों पर मामला दर्ज करना अनिवार्य होगा। धारा 14 के तहत दोषी संगठनों पर प्रतिबंध और जुर्माने का भी प्रावधान है। हालांकि अन्य धर्म से हिंदू धर्म में जाने पर ऐसे कड़े प्रावधान का जिक्र इस विधेयक में नहीं है।
हिंदू धर्म से अन्य धर्म में जाने के इच्छुक व्यक्तियों को अब निर्धारित सरकारी अधिकारी से पूर्व अनुमति लेनी होगी और 60 दिन पहले नोटिस देना होगा। धर्मांतरण के बाद उसका पंजीकरण कराना भी अनिवार्य होगा, अन्यथा उसे अमान्य माना जा सकता है। सजा के कड़े प्रावधानों के तहत, शादी के बहाने अवैध धर्मांतरण कराने पर सात साल की जेल और एक लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है। नाबालिग, महिला या एससी-एसटी वर्ग के व्यक्ति के धर्मांतरण पर सात साल की जेल और पांच लाख रुपये जुर्माना होगा।
सामूहिक धर्मांतरण के दोषियों को भी सात साल की कैद भुगतनी होगी, जबकि बार-बार अपराध करने वालों को 10 साल की सजा हो सकती है। महायुति सरकार का तर्क है कि यह कानून बहुसंख्यक हिंदुओं को अल्पसंख्यकों की ओर से चलाये जा रहे 'धर्मांतरण रैकेट' से बचाने के लिए जरूरी है। महाराष्ट्र के मत्स्य पालन और बंदरगाह विकास मंत्री नितेश राणे ने इसका समर्थन करते हुए कहा कि संविधान धर्म मानने की आजादी देता है, लेकिन किसी को धोखे या लालच से हिंदुओं का धर्मांतरण करने का अधिकार नहीं देता।
दूसरी ओर, महिला अधिकार समूहों और नागरिक स्वतंत्रता संगठनों सहित 35 से अधिक संस्थाओं ने इस विधेयक का कड़ा विरोध किया है। 'मुंबई फॉर पीस' और 'बॉम्बे कैथोलिक सभा' जैसे संगठनों का कहना है कि यह कानून महिलाओं की स्वायत्तता, निजता और संवैधानिक स्वतंत्रता के लिए खतरा है। नागरिक समाज के प्रतिनिधियों का आरोप है कि यह कानून 'लव जिहाद' जैसे राजनीतिक आरोपों पर आधारित है। उनका मानना है कि इससे शादी और आस्था जैसे निजी मामलों में राज्य का हस्तक्षेप बढ़ेगा और व्यक्तिगत पसंद की आजादी प्रभावित होगी।



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