आप उसे इज्ज़त के साथ अलविदा कह रहे हैं! 13 साल से कोमा में गए हरीश को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया की इजाज़त दी, जज हुए इमोशनल

Wed, Mar 11 , 2026, 04:25 PM

Source : Hamara Mahanagar Desk

Harish Rana Case : सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने देश के ज्यूडिशियल सिस्टम (judicial system) में एक बहुत ही सेंसिटिव और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से कोमा में रहे 32 साल के हरीश राणा को 'पैसिव यूथेनेशिया (passive euthanasia)' की इजाज़त दे दी है। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और के. वी. विश्वनाथन की बेंच ने यह फैसला सुनाया। यह फैसला सुनाते हुए कोर्ट का माहौल इमोशनल हो गया। जस्टिस पारदीवाला ने हरीश के माता-पिता से कहा, 'आप अपने बेटे को छोड़ नहीं रहे हैं, आप उसे इज्ज़त के साथ अलविदा कह रहे हैं', और उनका गला रुंध गया।

 असली मामला क्या है?
हरीश राणा 2013 में चंडीगढ़ में स्टूडेंट रहते हुए एक बिल्डिंग की चौथी मंज़िल से गिर गए थे। हादसे में उनके दिमाग में गंभीर चोट आई थी। इसके बाद, वह वेजिटेटिव स्टेट में चला गया और पिछले 13 सालों से कोमा में था। उसके दिमाग की नसें भी सूख गई थीं और उसकी ज़िंदगी पूरी तरह से लाइफ सपोर्ट और एक फीडिंग ट्यूब पर निर्भर थी। लड़के की यह हालत देखकर, उसके बुज़ुर्ग माता-पिता ने कोर्ट से उसका लाइफ सपोर्ट हटाने की इजाज़त मांगी थी।

पैसिव यूथेनेशिया इंडिया: 2018 के फैसले का अगला कदम
2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने भारत में पैसिव यूथेनेशिया को कानूनी बना दिया था। हालांकि, यह देश का पहला मामला है जहां इसे उन गाइडलाइंस के अनुसार लागू किया गया है। इस फैसले ने 2018 की गाइडलाइंस में कुछ कन्फ्यूजन को भी दूर किया है, खासकर उन मरीज़ों के मामलों को लेकर जो फीडिंग ट्यूब पर जी रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ऑब्ज़र्वेशन हरीश राणा: कोर्ट का ज़रूरी ऑब्ज़र्वेशन
कोर्ट ने अपने ऑब्ज़र्वेशन में कहा कि किसी व्यक्ति को अनिश्चित समय के लिए ऐसी हालत में रखना इंसानियत के खिलाफ है। कोर्ट ने दिल्ली के AIIMS हॉस्पिटल को हरीश राणा को एडमिट करने का भी निर्देश दिया और उनका लाइफ सपोर्ट हटाने का प्रोसेस मेडिकल सुपरविज़न में धीरे-धीरे किया जाएगा।

हरीश राणा इमोशनल फैसला: माता-पिता की हिम्मत की तारीफ़
यह फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने हरीश के माता-पिता के 13 साल के सब्र, हिम्मत और लगन की खास तौर पर तारीफ़ की। कोर्ट ने कहा कि यह फैसला सिर्फ़ कानून का मामला नहीं है बल्कि प्यार, मेडिकल साइंस और इंसानी सेंसिटिविटी का संगम है।

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