गुरु तेग बहादुर साहिब जी की अमर शहादत ! जीवन जीने की कला सिखाते हैं गुरु तेग बहादुर, जो मान-अपमान नूं बराबर समझदा है…

Sat, Feb 28 , 2026, 12:42 PM

Source : Hamara Mahanagar Desk

The immortal martyrdom of Guru Tegh Bahadur Sahib: गुरुबाणी इन की पंक्तियों के माध्यम से नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी (Shri Guru Tegh Bahadur Sahib) ने स्थिरचित्त, निर्भय और निस्पृह जीवन का आदर्श समाज के सामने रखा। निंदा-स्तुति, हर्ष-शोक, मान-अपमान से परे जाकर सत्य के लिए खड़े रहने की शिक्षा उन्होंने केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अपने जीवन और शहादत से दी।

त्यागमल से ‘तेग बहादुर’ — शौर्य और अध्यात्म का संगम
छठे गुरु श्री गुरु हरगोबिंद जी के पुत्र का बाल नाम ‘त्यागमल’था। करतारपुर के युद्ध में उनके अद्वितीय पराक्रम के कारण उन्हें ‘तेग बहादुर’अर्थात ‘शूर तलवारबाज’नाम प्राप्त हुआ। शौर्य और त्याग का अद्वितीय संगम उनके व्यक्तित्व में दिखाई देता है। आठवें गुरु श्री गुरु हरकृष्ण जी के निधन के बाद 1665 में वे गुरु गद्दी पर विराजमान हुए। पंजाब के बाबा बकाला में उन्होंने नौवें गुरु के रूप में दायित्व स्वीकार किया और सिख पंथ को नया आध्यात्मिक नेतृत्व दिया।

एक ओंकार’से सर्वधर्म समभाव
पहले गुरु श्री गुरु नानक देव जी द्वारा दिया गया ‘एक ओंकार’का संदेश केवल धार्मिक नहीं था, बल्कि सामाजिक समता का ध्वज था। जात-पात, ऊँच-नीच, भेदभाव से परे जाकर मानवता का विचार उन्होंने दिया। लंगर परंपरा के माध्यम से समानता का प्रत्यक्ष अनुभव कराया। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने धर्म स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की रक्षा को अपना ध्येय माना।

अन्याय के विरुद्ध खड़े रहने की प्रेरणा
मुगलकालीन दमन की पृष्ठभूमि में जब निर्दोष नागरिकों पर अन्याय हो रहा था, तब जनता ने श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी को पुकारा। उन्होंने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया और धर्म स्वतंत्रता के लिए निर्भय होकर खड़े रहे। उनके सहयोगी भाई मती दास, भाई सती दास और भाई दयाला को अमानवीय यातनाएं सहनी पड़ीं। परंतु गुरु जी डगमगाए नहीं। 11 नवंबर 1675 को दिल्ली के चांदनी चौक में, जहां आज गुरुद्वारा शीशगंज साहिब स्थित है, वहां उन्होंने अपना शीश अर्पित किया। उन्होंने धर्मांतरण या चमत्कार दिखाने से इंकार करते हुए शहादत स्वीकार की। उनके इस सर्वोच्च त्याग के कारण उन्हें “हिंद दी चादर”की उपाधि मिली, अर्थात हिंदुस्तान के धर्म-संस्कृति की रक्षा करने वाली ढाल।

अंतिम संस्कार और अमर स्मृति
शहादत के बाद उनके पार्थिव का अंतिम संस्कार करने पर प्रतिबंध था। परंतु लखी शाह बंजारा ने अपने घर को अग्नि देकर गुरु जी का अंतिम संस्कार किया। उस स्थान पर आज गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब निर्मित है। उनका शीश भाई जैता जी ने आनंदपुर साहिब ले जाकर दसवें गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी को सुपुर्द किया। उस स्थान पर आज आनंदपुर साहिब पवित्र स्थल है। श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने दोहे में लिखा: “शीख दिया पर सिरर न दिया, धर्म हेतु साका जिन किया।”

बलिदान का सच्चा अर्थ
श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का बलिदान किसी व्यक्ति के विरोध में नहीं था; वह असहिष्णुता की विचारधारा के विरुद्ध था। उन्होंने केवल अपना सिर नहीं दिया, बल्कि जीने का मार्ग दिया—अन्याय के सामने न झुकने का, सत्य के लिए खड़े रहने का और मानवता की सेवा करने का। भारतीय संस्कृति ‘वसुधैव कुटुंबकम्’, सर्वधर्म समभाव और सहजीवन का संदेश देती है। हजारों मत-मतांतर होने पर भी साथ रहने की क्षमता ही भारतीयता की सच्ची पहचान है।

आज की पीढ़ी के लिए संदेश
भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का स्वप्न देख रहा है। परंतु विकास केवल आर्थिक नहीं होता; वह मूल्याधारित होता है। सत्य, साहस, त्याग, कर्तव्य और समभाव ही गुरु परंपरा की देन हैं। आज के युवाओं के लिए श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की शहादत केवल इतिहास की घटना नहीं; वह जीवन की दिशा है।

संत भक्त नामदेव का संदेश संत भक्त नामदेव कहते हैं:
“ऐसा गुरु वडभागी पाइआ, जिनि हउमै मारि सबदि मिलाइआ।”
अहंकार का नाश कर परम सत्य से एकरूप करने वाला गुरु भाग्य से ही मिलता है। श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का जीवन उसका जीवंत उदाहरण है। राष्ट्र, संस्कार और संस्कृति के संरक्षण के लिए दिया गया उनका बलिदान भारतीय इतिहास का स्वर्णिम पृष्ठ है। उनकी शहादत से प्रेरणा लेकर हम ऐसा भारत बनाने का संकल्प लें, जहां सहिष्णुता, न्याय, मानवाधिकार और वैश्विक शांति सर्वोच्च हों। यही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि है।

ऐतिहासिक संबंध
हिंद-दी-चादर”कार्यक्रमों के माध्यम से श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के बलिदान का स्मरण राज्य शासन के अल्पसंख्यक विभाग द्वारा आयोजित कार्यक्रमों के माध्यम से किया जा रहा है। स्वतंत्रता की रक्षा, श्रद्धा की स्वतंत्रता, मानवता का संरक्षण और मानवीय गरिमा के लिए दी गई उनकी सर्वोच्च शहादत का यह कालातीत प्रतीक है।

यह ऐतिहासिक स्मरणोत्सव बहुदिवसीय, व्यापक स्वरूप के सार्वजनिक कार्यक्रम के रूप में आयोजित किया जा रहा है, जिसमें आध्यात्मिक साधना, ऐतिहासिक जागरूकता, युवाओं की भागीदारी तथा सामाजिक एकात्मता का समन्वय किया जा रहा है। पहली बार इस उपक्रम के माध्यम से सिख, सिकलीगर, बंजारा, लबाना, सिंधी, मोहयाल, वाल्मीकि तथा भक्त नामदेव संप्रदाय जैसे श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी से ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंध रखने वाले समुदायों को एक समान मंच पर लाने का सजग प्रयास किया जा रहा है।

350 वर्षों बाद इस ऐतिहासिक संबंध का पुनरुज्जीवन और सुदृढ़ीकरण करने का राज्य सरकार का यह एक ईमानदार प्रयास है। इन कार्यक्रमों में आध्यात्मिक प्रवचन, कीर्तन, ऐतिहासिक प्रदर्शनी, शैक्षणिक प्रस्तुतियां तथा सामुदायिक संवाद का समावेश है, जिससे श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के जीवन, कार्य, शिक्षाओं और त्याग का गहन दर्शन कराया जा रहा है। गुरु जी की शहादत का ऐतिहासिक महत्व और संवैधानिक मूल्य—धर्म स्वतंत्रता, समानता और न्याय—से उनके संबंध को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का उद्देश्य है।

इन कार्यक्रमों के माध्यम से गुरु जी के काल में बंजारा और लबाना समाज द्वारा दिए गए सहयोग पर प्रकाश डाला जा रहा है। साथ ही औरंगजेब के शासनकाल में अत्यंत जोखिमपूर्ण परिस्थितियों में भी श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का अंतिम संस्कार संपन्न कराने वालों के अद्वितीय साहस का गौरव किया जा रहा है। इसके साथ ही श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के अंतिम क्षण तक दृढ़ता से साथ रहने वाले मोहयाल समाज के भाई मती दास जी, भाई सती दास जी और भाई दयाला जी की सर्वोच्च शहादत को भी नमन किया जा रहा है। श्री गुरु नानक देव जी की परंपरा के अनुसार सिंधी समाज भी इस उपक्रम का अविभाज्य भाग है। “गुरु नानक नाम लेवा संगत”की अवधारणा के अंतर्गत इन शिक्षाओं पर विश्वास रखने वाले सभी को एक समान मंच पर लाया जा रहा है। इस कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण केंद्रबिंदु सेवा भावना से आयोजित किया जाने वाला भव्य लंगर है, जो गुरु जी की समानता, करुणा और निःस्वार्थ सेवा के मूल्यों का प्रतीक है।

केंद्र सरकार की ओर से भी विभिन्न उपक्रम आरंभ किए गए हैं—श्री गुरु तेग बहादुर जी से संबंधित करतारपुर कॉरिडोर का कार्य पूर्ण करना हो, हेमकुंड साहिब में रोपवे परियोजना का निर्माण हो, अथवा आनंदपुर साहिब स्थित विरासत-ए-खालसा संग्रहालय का विस्तार—इन सभी के माध्यम से गुरु के प्रत्येक पवित्र स्थल को आधुनिक भारत की दृष्टि से जोड़ने का प्रयास किया गया है।

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