Garal Kanteshwar Mahadev: पांडवों के अज्ञातवास की धरोहर: रामनगर के जंगलों में विराजमान गरल कंठेश्वर महादेव!

Sun, Feb 15 , 2026, 06:53 PM

Source : Uni India

रामनगर।  उत्तराखंड की पावन धरती अपने भीतर इतिहास, पुराण और आस्था की अनगिनत परतें समेटे हुए है। इन्हीं में से एक अद्भुत और रहस्यमयी धरोहर नैनीताल जनपद के रामनगर क्षेत्र में स्थित गरल कंठेश्वर महादेव मंदिर है (Garal Kanteshwar Mahadev Temple)। घने जंगलों और प्राकृतिक सौंदर्य के बीच बसे ढिकुली गांव में स्थित यह प्राचीन शिव मंदिर (Shiva temple) न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि महाभारत कालीन इतिहास और पुरातात्विक महत्व का भी सशक्त प्रमाण माना जाता है।

महाभारत काल से जुड़ी मान्यताएं जनश्रुतियों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास के अंतिम वर्ष के दौरान यहां समय बिताया था। विशेष रूप से यह मान्यता प्रचलित है कि महाबली भीम ने स्वयं इस पवित्र शिवलिंग की स्थापना की थी।
महाभारत के अनुसार अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने अपना अंतिम वर्ष राजा विराट के संरक्षण में बिताया था। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि प्राचीन ‘विराट नगर’ वर्तमान ढिकुली क्षेत्र ही था। इसी दौरान पांडवों ने भगवान शिव (worship Lord Shiva) की आराधना के लिए इस शिवलिंग की स्थापना की, जो आज गरल कंठेश्वर महादेव के रूप में पूजित है। यह मंदिर विश्व प्रसिद्ध जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के बफर जोन में स्थित है। घने साल के जंगलों और शांत वातावरण के बीच स्थित यह स्थल श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों दोनों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

पुरातत्व विभाग ने इस मंदिर और आसपास के क्षेत्र को संरक्षित स्मारक घोषित किया है। मंदिर परिसर और उसके आसपास की खुदाई में प्राचीन प्रस्तर स्तंभ, अलंकृत खंभे, मूर्तियां और अन्य पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो यहां किसी विकसित सभ्यता के अस्तित्व की ओर संकेत करते हैं। ये अवशेष इस क्षेत्र की प्राचीनता और सांस्कृतिक समृद्धि को प्रमाणित करते हैं। इतिहासकारों के अनुसार सातवीं शताब्दी में भारत आए प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी अपनी यात्रा-वृत्तांत में इस क्षेत्र का उल्लेख किया है। उनके विवरण से यह संकेत मिलता है कि यह स्थान प्राचीन काल में भी धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है।

मंदिर परिसर के पास एक प्राचीन कुआं और अविरल जलधारा स्थित है, जिसे स्थानीय लोग भीम द्वारा निर्मित मानते हैं। मान्यता है कि इस कुएं का जल कभी नहीं सूखता और इसमें विशेष आध्यात्मिक शक्ति है। श्रद्धालु यहां जलाभिषेक कर भगवान शिव से मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करते हैं। संस्कृत विद्यालय के प्राचार्य डॉ. दिनेश चंद्र हरबोला का कहना है कि यह स्थान सिद्धपीठ के रूप में प्रतिष्ठित है और यहां भगवान शंकर का साक्षात वास माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर इच्छा अवश्य पूर्ण होती है। इतिहासकारों का मानना है कि यह पूरा क्षेत्र प्राचीन सभ्यता और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। यदि यहां व्यवस्थित शोध और संरक्षण कार्य किया जाए तो कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य सामने आ सकते हैं। महाशिवरात्रि और सावन मास के दौरान गरल कंठेश्वर महादेव मंदिर में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। दूर-दूर से भक्त यहां जलाभिषेक करने आते हैं। पूरे परिसर में ‘हर-हर महादेव’ के जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो उठता है।

यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और प्रकृति का अद्भुत संगम है। यहां की शांति, दिव्यता और प्राचीनता हर आगंतुक को आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करती है। इतिहास, पुरातत्व और धार्मिक महत्व से परिपूर्ण यह स्थल शोधकर्ताओं और इतिहास प्रेमियों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्थानीय प्रशासन और पुरातत्व विभाग को इस धरोहर के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस प्राचीन विरासत को समझ और संजो सकें। गरल कंठेश्वर महादेव मंदिर न केवल भगवान शिव का पवित्र धाम है, बल्कि यह भारत की प्राचीन सभ्यता और महाभारत कालीन गौरव का जीवंत प्रमाण भी है। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां दर्शन करना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि इतिहास और आध्यात्मिकता से साक्षात्कार करने जैसा अनुभव है।

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