नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर राज्य सरकार एवं चुनाव आयोग के बीच "विश्वास की कमी" (lack of trust) और सहयोग के अभाव पर गंभीर चिंता जताई है तथा स्थिति को "असाधारण" बताते हुए दावों और आपत्तियों के निपटारे की निगरानी के लिए वर्तमान एवं पूर्व न्यायिक अधिकारियों की तैनाती के शुक्रवार को आदेश दिए। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि प्रक्रिया "लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी" सूची में शामिल मतदाताओं से संबंधित आपत्तियों के चरण पर अटक गई है। अदालत ने कहा कि जिन लोगों को नोटिस जारी किए गए थे, उनमें से अधिकांश ने मतदाता सूची में शामिल किए जाने के समर्थन में दस्तावेज जमा कर दिए हैं और इन दावों का अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया के तहत निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) द्वारा निपटारा किया जाना आवश्यक है।
अदालत ने निर्देश दिया कि संबंधित जिलों के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक न्यायिक अधिकारियों को आवश्यक प्रशासनिक व लॉजिस्टिक सहयोग प्रदान करें। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि सुनवाई के दौरान जारी निर्देशों के पालन हेतु दोनों अधिकारियों को "डीम्ड डेपुटेशन" पर माना जाएगा। राज्य द्वारा तैनात अधिकारियों की योग्यता और पद-स्तर को लेकर उठे विवादों को देखते हुए शीर्ष अदालत ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि वे सेवारत न्यायिक अधिकारियों तथा पूर्व जिला या अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों को जिला-वार दावों और आपत्तियों के निस्तारण में सहयोग के लिए उपलब्ध कराएं। अदालत ने माना कि इससे नियमित न्यायिक कार्य प्रभावित हो सकता है, इसलिए उच्च न्यायालय से आवश्यक प्रशासनिक व्यवस्था करने को कहा गया।
इससे पहले गत 09 फरवरी को न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह निर्वाचन आयोग को उपलब्ध कराए गए अधिकारियों को ड्यूटी पर भेजना सुनिश्चित करे। निर्वाचन आयोग ने गैर-सहयोग और योग्य अधिकारियों की कमी का आरोप लगाया था। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, "आप सक्षम ग्रुप-ए अधिकारी उपलब्ध नहीं करा रहे। अयोग्य अधिकारी लोगों के भाग्य का फैसला कैसे कर सकते हैं?"
न्यायमूर्ति बागची ने भी कहा कि दोनों पक्षों में हिचकिचाहट दिखाई दे रही है और न्यायिक अधिकारियों की भागीदारी से प्रक्रिया को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जा सकता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग द्वारा तैनात 'स्पेशल रोल ऑब्जर्वर' वैधानिक ईआरओ के निर्णयों को प्रभावित कर रहे हैं और लगभग सात लाख लोगों को चिह्नित किया गया है। आयोग ने हालांकि इन आरोपों से इनकार किया। सुनवाई के दौरान अदालत ने एसआईआर प्रक्रिया के दौरान कथित धमकी और हिंसा की शिकायतों पर भी संज्ञान लिया और पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक को चेतावनी दी कि शिकायतों पर कार्रवाई न होने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।पीठ ने संकेत दिया कि यदि प्रक्रिया पूरी हो जाती है तो 28 फरवरी के बाद एक सूची प्रकाशित की जा सकती है, हालांकि वह अंतिम नहीं होगी और एक पूरक सूची भी जारी की जा सकती है। मामले की अगली सुनवाई मार्च में होगी।



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